एक विद्यार्थी की आत्मकथा | Autobiograpy Of Student In Hindi

एक विद्यार्थी की आत्मकथा

(प्रस्तावना –भूमिका-मेरे पिता-माता की मेरे विषय में कल्पना-मेरी चिंतना-
मेरा विद्यार्थी जीवन-उपसंहार)

आज़ जव विद्यालय में पढ़ते हुए १० वर्ष व्यतीत हो गए हैं, तव सोचता हूँ कि यह विद्यार्थी जीवन सचमुच कितना मूल्यवान है । पहले मैं स्कूल जाने से कितना डरता था । मेरे घर वाले मुझे कितना प्रलोभन दिया करते थे। कभी मिठाई का, कभी कपड़ों का, कभी खेल खिलौनों का । और मैं था कि पढ़ाई के नाम पर इन सब प्रिय चीजों से भी भागता फिरता था । लेकिन अब जव में इतना आगे वढ़ आया हूँ, तो पिछले वीते हुए दिन याद आकर मन- प्राणों में सुख सा वरसा देते हैं ।
उन दिनों में मैं अपने मामा के घर रहता था । शिक्षा का संस्कार मुझमें उन्हीं के घर पर डाला गया । मेरे मामा पहाड़ के एक गाँव में रहते थे । विद्यालय छोटा सा था । केवल बाथी श्रेणी तक । उसमें केवल एक अध्यापक थे । सभी कक्षाओं को वे पढ़ाया करते थे । स्कूल के नाम पर एक छोटा-सा कमरा था और एक लंबा बड़ा सा वरामदा । जहाँ पर कक्षा दूसरे के पीछे बैठा करते थे । हर कक्षा में मुश्किल से ५-७ या
८-८ विद्यार्थी थे । हमारे सामने अध्यापक ख्याली राम जी बैठ कर हमें पढ़ाया करते थे ।
शुरू-शुरू में मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता था । एक तो बड़े सवेरे उठना पड़ता था । फिर लगभग दो मील पैदल जाना पड़ता था। पहाड़ की चोटी पर स्कूल था। वहाँ पहुँचत न पहुचत में थक जाया करता था। रोज घर लाटकर मैं अपना रोना- धोना शुरू कर दना कि कल स्कूल नहीं जाऊँगा । लेकिन दूसर दिन फिर स्कूल के समय पर मुझस नए नए वायदे किए जाते, नए-नए प्रलोभन दिए जाते और मैं फ़िर अपने आँसुओं को पोछता हुआ अपने साथियों के साथ स्कूल चल देता ।
लेकिन वेमन से स्कूल जाने की यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। धीरे-धीरे मुझ स्कूल की पढ़ाई में तो नहीं, स्कूल के वातावरण में रस आने लगा । यह ठीक था कि मास्टर ख्याली राम हमें जो कुछ एक वार पढ़ा देते, वह हमेशा याद रहता । लेकिन इस स्कूल में पढ़ाई कम, मस्ती ज्यादा होती थी । कभी हम मास्टरजी के पाँव दवाते, कभी उनके घर का कोई काम करने चले जाते । कभी वह हमें नीचे नदी में से मछली पकड़ने भेज देते । तव हम बड़े खुश होते और छुट्टी के समय ही स्कूल से लौटते । इस तरह जीवन के ४ वर्ष मामाजी के गाँव में बीत गए ।
भाग्य की वात, उस छोटे से गाँव से मुझे सीधे बंबई आ जाना पड़ा । यहाँ का जीवन ही
दूसरा है | बड़े बड़े स्कूल, बड़ी-बड़ी कक्षाएँ । साफ सुथरे कपड़े पहने सब विद्यार्थी । गणवेश मुझे बहुत भाया । यहाँ बंबई में मेरे भाई रहते हैं । मैं उनके पास ही रहता हूँ । उन्होंने मुझे हिन्दी स्कूल में प्रवेश दिला दिया । यहाँ खूब पढ़ाई होती है । कक्षा के सहपाठी बड़ी-बड़ी वातें कहते हैं । अपने जीवन के विषय में उनकी बड़ी बड़ी योजनाएँ हैं । अव में भी इसी दिशा में सोचने लगा हूँ । लेकिन सोचते-सोचते सहसा रुक जाता हूँ, सोचता हूँ, पहले स्कूल की पढ़ाई पूरी कर लूँ । फिर कॉलेज में भी तो ४-६ वर्ष पढ़ना ही पड़ेगा । तभी यह सव सोचा जाएगा।
इस वड़े शहर में आकर मेरी दिनचर्या भी निश्चित हो गई है। सवर ५ वजे उठता हूँ । ५.३० बजे तक शौच आदि से निवृत्त हो जाता हूँ । फिर थोड़ी-सी मालिश करता हूँ। कुछ देर रुक कर नहाता हूँ । उसके बाद एक कप दूध पीकर पढ़ने वैठ जाता हूँ । ७ वजे तक पढ़ता हूँ । फिर अपनी किताबें ठीक करके स्कूल के लिए निकल जाता हूँ । मेरा विद्यालय ७|| वजे से शुरू होता है । १ बजे तक विद्यालय में रहता हूँ |
फिर घर आता हूँ । खाना खाकर कुछ समय विश्राम करता हूँ । जव उठता हूँ तो उस समय ३ वजे रहे होते हैं। चाय पीकर पढ़ने बैठ जाता हूँ | इस समय मैं स्कूल का काम करता । लगभग २ घंटे में काम पूरा हो जाता है । उसके बाद मैं वाहर घूमने और सैर सपाटे को निकल जाता हूँ । ८ वजे मुझे घर में आ ही जाना चाहिए । ऐसी मेरे भाई की आज्ञा है । घर लौटकर मैं थोड़ी देर के लिए प्रार्थना करता हूँ । प्रार्थना क्या, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों के कुछ श्लोक पढ़ता हूँ | फिर खाना खाता हूँ और उसके वाद १० वजे तक पढ़ता हूँ । इस समय मैं पाठ्य-क्रम से वाहर की पुस्तकें पढ़ता हूँ | १० बजे मैं सोने के लिए चला जाता हूँ । दूसरे दिन सवेरे ५ वजे से फिर वही क्रम आरंभ हो जाता है |
महानगरी के इस वातावरण ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है । यहाँ मैंने बहुत कुछ देखा, सुना और सीखा है । अव सोचता हूँ कि विद्यार्थी के जीवन में व्यवस्था का होना बहुत आवश्यक है। अगर विद्यार्थी में व्यवस्था और ठीक समय से काम करने की आदत न हो तो वह सफल नहीं हो सकता । यहाँ आकर मेरी आँखें खुल गई है । मैं भी अव एक विशेप
व्यक्ति वन कर समाज में प्रतिष्ठित नागरिक बनना चाहता हूँ । इसीलिए मैं रात के समय नियमित रूप से अधिकतर उन महापुरुषों के जीवनचरित्र पढ़ा करता हूँ जिन्होंने मेरी तरह बहुत साधारण परिवार में जन्म लिया । लेकिन जा अपनी प्रतिभा से, आग चलकर समाज के श्रेष्ठ पुरुप वने ।
में अपने विद्यार्थी जीवन से संतुष्ट हूँ | मरा भविष्य क्या होगा यह कहने के लिए अभी में अपने का याग्य नहीं पाता ।

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