एक विद्यार्थी की आत्मकथा | Autobiograpy Of Student In Hindi

एक विद्यार्थी की आत्मकथा | Autobiograpy Of Student In Hindi

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एक विद्यार्थी की आत्मकथा 

विद्यार्थी के तौर पर भूमिका:

मुझे बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मैं एक पढ़ा-लिखा विद्यार्थी हूं । और मैंने यह सफर जब मैं 3 वर्ष का था तब प्रारंभ किया मेरा जन्म उत्तराखंड के पहाड़ी विभाग में हुआ वहीं से मैंने अपनी स्कूल का पहला दिन एक विद्यार्थी के तौर पर आरंभ किया।

आज़ जब विद्यालय में पढ़ते हुए १० वर्ष व्यतीत हो गए हैं, तब सोचता हूँ कि यह विद्यार्थी जीवन सचमुच कितना मूल्यवान है । पहले मैं स्कूल जाने से कितना डरता था । मेरे घर वाले मुझे कितना प्रलोभन दिया करते थे। कभी मिठाई का, कभी कपड़ों का, कभी खेल खिलौनों का । और मैं था कि पढ़ाई के नाम पर इन सब प्रिय चीजों से भी भागता फिरता था । लेकिन अब जव में इतना आगे वढ़ आया हूँ, तो पिछले वीते हुए दिन याद आकर मन- प्राणों में सुख सा वरसा देते हैं ।

उन दिनों में मैं अपने मामा के घर रहता था । शिक्षा का संस्कार मुझमें उन्हीं के घर पर डाला गया । मेरे मामा पहाड़ के एक गाँव में रहते थे । विद्यालय छोटा सा था । केवल बाथी श्रेणी तक । उसमें केवल एक अध्यापक थे ।

मेरा विद्यार्थी जीवन:

सभी कक्षाओं को वे पढ़ाया करते थे । स्कूल के नाम पर एक छोटा-सा कमरा था और एक लंबा बड़ा सा वरामदा । जहाँ पर कक्षा दूसरे के पीछे बैठा करते थे । हर कक्षा में मुश्किल से ५-७ या ८-८ विद्यार्थी थे । हमारे सामने अध्यापक ख्याली राम जी बैठ कर हमें पढ़ाया करते थे ।

शुरू-शुरू में मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता था । एक तो बड़े सवेरे उठना पड़ता था । फिर लगभग दो मील पैदल जाना पड़ता था। पहाड़ की चोटी पर स्कूल था। वहाँ पहुँचत पहुचते में थक जाया करता था। रोज घर लौटकर मैं अपना रोना- धोना शुरू कर देना कि कल स्कूल नहीं जाऊँगा ।

लेकिन दूसर दिन फिर स्कूल के समय पर मुझस नए नए वादे किए जाते, नए-नए प्रलोभन दिए जाते और मैं फ़िर अपने आँसुओं को पोछता हुआ अपने साथियों के साथ स्कूल चल देता ।

लेकिन वेमन से स्कूल जाने की यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। धीरे-धीरे मुझ स्कूल की पढ़ाई में तो नहीं, स्कूल के वातावरण में रस आने लगा । यह ठीक था कि मास्टर ख्याली राम हमें जो कुछ एक बार पढ़ा देते, वह हमेशा याद रहता । लेकिन इस स्कूल में पढ़ाई कम, मस्ती ज्यादा होती थी । कभी हम मास्टरजी के पाँव दबाते, कभी उनके घर का कोई काम करने चले जाते । कभी वह हमें नीचे नदी में से मछली पकड़ने भेज देते । तव हम बड़े खुश होते और छुट्टी के समय ही स्कूल से लौटते । इस तरह जीवन के ४ वर्ष मामाजी के गाँव में बीत गए ।

मेरे माता-पिता:

उसी दौरान मेरे पिताजी का निधन हो गया और अब घर में मैं और मेरी मां सिर्फ बच्चे इस समय मेरे जीवन में बहुत सी कठिनाई आई परंतु मुझे एक विद्यार्थी के तौर पर मुझे और पढ़ना था मेरी मां ने मुझे सलाह दिया कि मैं अपने बड़े भाई के पास मुंबई चले जाओ और वही कोई अच्छे से स्कूल में प्रवेश करो क्योंकि मेरे बड़े भैया वहां शहर में थे तो आसानी होगी।

भाग्य की बात, उस छोटे से गाँव से मुझे सीधे मुंबई आ जाना पड़ा । यहाँ का जीवन ही दूसरा है | बड़े बड़े स्कूल, बड़ी-बड़ी कक्षाएँ । साफ सुथरे कपड़े पहने सब विद्यार्थी । यहाँ मुंबई में मेरे भाई रहते हैं । मैं उनके पास ही रहता हूँ । उन्होंने मुझे हिन्दी स्कूल में प्रवेश दिला दिया । यहाँ खूब पढ़ाई होती है ।

कक्षा के सहपाठी बड़ी-बड़ी बातें कहते हैं । अपने जीवन के विषय में उनकी बड़ी बड़ी योजनाएँ हैं । अब में भी इसी दिशा में सोचने लगा हूँ । अब मैं पढ़ाई में तेज भी हो गया था तो इस स्कूल के कुछ संस्थाएं मुझे छात्रवृत्ति भी प्रदान किए मेरे मेरे नौवीं और दसवीं कक्षा के लिए।

लेकिन सोचते-सोचते सहसा रुक जाता हूँ, सोचता हूँ, पहले स्कूल की पढ़ाई पूरी कर लूँ । फिर कॉलेज में भी तो ४-६ वर्ष पढ़ना ही पड़ेगा । तभी यह सब सोचा जाएगा।

इस बड़े शहर में आकर मेरी दिनचर्या भी निश्चित हो गई है। सबेरे ५ बजे उठता हूँ । ५.३० बजे तक शौच आदि से निवृत्त हो जाता हूँ । फिर थोड़ी-सी मालिश करता हूँ। कुछ देर रुक कर नहाता हूँ । उसके बाद एक कप दूध पीकर पढ़ने बैठ जाता हूँ । ७ वजे तक पढ़ता हूँ । फिर अपनी किताबें ठीक करके स्कूल के लिए निकल जाता हूँ । मेरा विद्यालय ७ बजे से शुरू होता है । १ बजे तक विद्यालय में रहता हूँ |

फिर घर आता हूँ । खाना खाकर कुछ समय विश्राम करता हूँ । जब उठता हूँ तो उस समय ३ वजे रहे होते हैं। चाय पीकर पढ़ने बैठ जाता हूँ | इस समय मैं स्कूल का काम करता । लगभग २ घंटे में काम पूरा हो जाता है । उसके बाद मैं बाहर घूमने और सैर सपाटे को निकल जाता हूँ । ८ वजे मुझे घर में आ ही जाना चाहिए । ऐसी मेरे भाई की आज्ञा है ।

घर लौटकर मैं थोड़ी देर के लिए प्रार्थना करता हूँ । प्रार्थना क्या, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों के कुछ श्लोक पढ़ता हूँ | फिर खाना खाता हूँ और उसके वाद १० वजे तक पढ़ता हूँ । इस समय मैं पाठ्य-क्रम से बाहर की पुस्तकें पढ़ता हूँ | १० बजे मैं सोने के लिए चला जाता हूँ । दूसरे दिन सबेरे ५ बजे से फिर वही क्रम आरंभ हो जाता है |

मेरी चिंतना:

महानगरी के इस वातावरण ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है । यहाँ मैंने बहुत कुछ देखा, सुना और सीखा है । अब सोचता हूँ कि विद्यार्थी के जीवन में व्यवस्था का होना बहुत आवश्यक है। अगर विद्यार्थी में व्यवस्था और ठीक समय से काम करने की आदत न हो तो वह सफल नहीं हो सकता ।

यहाँ आकर मेरी आँखें खुल गई है । मैं भी अब एक विषेस व्यक्ति बन कर समाज में प्रतिष्ठित नागरिक बनना चाहता हूँ । इसीलिए मैं रात के समय नियमित रूप से अधिकतर उन महापुरुषों के जीवनचरित्र पढ़ा करता हूँ जिन्होंने मेरी तरह बहुत साधारण परिवार में जन्म लिया । जिन्होंने अपनी प्रतिभा से, आग चलकर समाज के श्रेष्ठ पुरूष बने । में अपने विद्यार्थी जीवन से संतुष्ट हूँ | मेरा भविष्य क्या होगा यह कहने के लिए अभी में अपने आप को याग्य नहीं पाता ।

आशा करता हूं आपको यह एक विद्यार्थी की आत्मकथा  निबंध पसंद आया होगा, कृपया करके आप यह निबंध अपने दोस्तों को भी शेयर करे। और यदि आप टीचर या परेंटे (Parents) है तो अपने बच्चो को जरूर बताएं धन्यवाद। आपको Autobiography of A Student In Hindi | मेरे विद्यालय का चपरासी पर निबंध का PDF फाइल डाउनलोड करने का लिंक नीचे है आप वह से डाउनलोड कर सकते है। Click Here to Download👉👉 एक विद्यार्थी की आत्मकथा  पर निबंध का PDF Download

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